सौर्य ऊर्जा द्वारा विद्युत ऊर्जा की ओर | Now yes or ….

सौर्य ऊर्जा द्वारा विद्युत ऊर्जा की ओर


सौर्य ऊर्जा द्वारा विद्युत उत्पादन आज भारत में उपलब्ध सर्वाधिक दक्ष तथा विश्वसनीय हरित ऊर्जा में से एक है। पृथ्वी पर सभी प्रकार की ऊष्मा का प्रधान स्रोत सूर्य है। सूर्य की सतह पर लगभग 6000° सेल्सियस तथा केन्द्र पर 20000000° सेल्सियस ताप का अनुमान लगाया जाता है । 186000 मील प्रति सैकण्ड की गति से चलती हुई लघु तरंगें सूर्य ताप कहलाती है।

विश्व में अधिकतम मात्रा में पायी जाने वाली तथा कभी समाप्त न होने वाली ऊर्जा, सौर्य ऊर्जा है। सौर्य ऊर्जा ऐसी उर्जा है जो सीधे सूर्य से प्राप्त की जाती है। सौर ऊर्जा ही मौसम एवं जलवायु में परिवर्तन करती है। यही धरती पर सभी प्रकार के जीवन (पेड़-पौधे और जीव-जन्तु) का सहारा है। वैसे तो सौर्य उर्जा का विविध प्रकार से प्रयोग किया जाता है, किन्तु सूर्य की उर्जा को विद्युत उर्जा में बदलने को ही मुख्य रूप से सौर्य उर्जा के रूप में जाना जाता है।

सौर्य ऊर्जा के प्रयोग हेतु दो तकनीक अत्यधिक प्रचलित है :

सौर्य थर्मल तकनीक: इसमें सौर्य ऊर्जा के माध्यम से बॉयलर में पानी को गर्म किया जाता है व इस गर्म पानी से भाप उत्पन्न कर, भाप से स्टीम टरबाईन के माध्यम से अल्टरनेटर चलाकर विद्युत का उत्पादन किया जाता है ।

सौर फोटो वोल्टीक प्रणाली: इसमें सौर पैनल्स के माध्यम से सीधे ही विद्युत उत्पन्न की जाती है। सौर सेल्स में Direct current का प्रवाह होता है। जिसे बैट्रियों में संग्रहित कर लिया जाता है। यदि Direct current के स्थान पर Alternating current की आवश्यकता हो तो सोलर सेल्स के द्वारा उत्पादित Direct current को ‘solar Inverter Unit’ के माध्यम से Alternating current में परिवर्तित कर इसे ग्रिड में प्रवाहित कर दिया जाता है।

॰ सौर्य ऊर्जा की प्रतिस्पर्धात्मक लागत तथा वृहद स्तर पर विद्युत उत्पादन सम्भावना के कारण विश्व एक महत्वपूर्ण तकनीकी क्रांति की ओर आगे बढ़ रहा है। जीवाश्म ईधन की अंधाधुंध खपत तथा सीमित भण्डार के कारण परम्परागत ऊर्जा स्रोतों से विद्युत उत्पादन की दर में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। तकनीकी अनुसंधान तथा विद्युत उत्पादन के क्षेत्र में सौर्य ऊर्जा की प्रचुर उपलब्धता के कारण सौर्य ऊर्जा से विद्युत उत्पादन की दर में अमूलभूत परिवर्तन सम्भव है।

अनुमानतः आगामी 8 से 10 वर्षों में सौर्य ऊर्जा उत्पादन लागत परम्परागत ऊर्जा उत्पादन से कम होगी। प्रकृति में कुछ ऐसे पदार्थ हैं जिनको सूर्य के प्रकाश में रखने पर उनकी अवरोधक शक्ति कम हो जाती है और वह प्रवाहक बन जाते हैं। ऐसे पदार्थों को अर्द्धचालक कहते हैं। इन्हीं पदार्थ का प्रयोग सौर ऊर्जा को सीधे विद्युत में परिवर्तित करने के काम में लिया जा सकता है। ये पदार्थ सिलिकॉन, जरमोनियम, गैलेनियम, अर्सेनाइड आदि हैं।

सौर्य ऊर्जा से विद्युत उत्पादन

सौर फोटो वोल्टीक संयंत्रों की कार्य प्रणाली साधारण है, सोलर पी.वी संयंत्र के मुख्य अवयव निम्न हैं:

1.सोलर पी.वी संयंत्र मुख्य पैनल, 2. चार्ज कंट्रोलर, 3. बैट्री, 4. लोड आदि ।

कार्य प्रणाली: दिन के समय सूर्य की रोशनी से सोलर पी.वी संयंत्र मुख्य पैनल द्वारा Direct current का उत्पादन होता है जिससे बैट्री चार्ज की जाती है। बैट्री से ऊर्जा प्राप्त होती है। यह प्रकिया निरंतर चलती रहती है। संयंत्र मे पैनल एवं बैट्री की डिजाइन इस प्रकार से तैयार की जाती है कि यदि दो-तीन दिन तक भी सूर्य न निकले तो भी संयंत्र कार्य करता रहे। सोलर पी.वी का दिन में प्रयोग ऊर्जा की आवश्यकतानुसार पूर्ति हेतु किया जा सकता है।

नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने एक उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना का विकास किया है ।

सौर्य ऊर्जा
सोलर पी.वी संयंत्र मुख्य पैनल

देश में सौर्य ऊर्जा क्षेत्र की वृद्धि को प्रेरित करने के लिए अनेक उपाय किये गए है, कुछ प्रमुख उपाय निम्नलिखित हैं :-
1. अनेक सौर्य ऊर्जा क्षेत्र प्रणालियों सम्बंधी आर्थिक सहायता।
2. प्रयोक्ताओं तथा विनिर्माताओं को उदार ऋण उपलब्ध कराने के लिये ब्याज सम्बन्धी आर्थिक सहायता।
3. कुछ कच्ची सामग्री संघटको तथा उत्पादों पर रियायती या शून्य आयात शुल्क।
4. उत्पाद शुल्क छूट।
5. प्रथम वर्ष में 80 प्रतिशत त्वरित मूल्य हा्रस।

भारत ने वर्ष 2020 के अंत तक 10000 मेगावाट सौर्य ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य तय किया है।यह प्रथम मौसम परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना के सौर ऊर्जा मिशन का भाग है। अक्षय ऊर्जा प्रणालियों की बढ़ती लोकप्रियता, ऊर्जा के वैकल्पिक साधनों की ओर अग्रसर होना रुचिकर और महत्वपूर्ण हो गया है। जहां तक अक्षय ऊर्जा का सम्बन्ध है, सौर्य विद्युत निश्चत रूप से प्राथमिक स्पष्ट विकल्प है। स्वच्छ तथा पर्यावरण अनुकूल अक्षय ऊर्जा स्रोतो की विगत कुछ वर्षों मे भारी वृद्धि हुई है।

प्रकाश वोल्टीक विद्युत उत्पादन देश के उन ग्रामीण क्षेत्रों में भी बिजली की उपलब्धता कर सकता है जहाँ ग्रिड लाइन नहीं है। यह सुरक्षित प्रौद्योगिकी के साथ स्थानीय रोजगार तथा सम्पति सृजन में भी सहायक है जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था में तेजी आयेगी।

ऊर्जा का दैनिक जीवन में अत्यन्त महत्व है। किसी भी अर्थव्यवस्था की वृद्धि ऊर्जा की पर्याप्त आपूर्ति पर निर्भर करती है। प्रति व्यक्ति ऊर्जा की खपत किसी देश की समृद्धि को मापने का एक संकेत है ऊर्जा की मांग मोटे तौर पर पांच क्षेत्रों में होती है। 1. घरेलू 2. उद्योग 3. परिवहन 4. विधुत उत्पादन 5. कृषि |
इन पांचों मांगो को सौर्य ऊर्जा से प्राप्त अक्षय ऊर्जा से एक हद तक पूरा किया जा सकता है।

सूर्य से सीधे प्राप्त होने वाली ऊर्जा की विशेषताएँ :

इसका अत्यधिक विस्तारित होना, अप्रदूषणकारी व अक्षुण होना प्रमुख हैं। सम्पूर्ण भारतीय भूभाग पर 5000 लाख करोड़ किलोवाट घंटा प्रति वर्ग मी० के बराबर सौर ऊर्जा आती है जो कि विश्व की संपूर्ण विद्युत खपत से कई गुना अधिक है। साफ धूप वाले अर्थात बिना धुंध व बादल के दिनों में प्रतिदिन का औसतन 4 से 7 किलोवाट घंटा प्रति वर्ग मीटर तक होता है। देश में वर्ष भर में लगभग 260 से 295 दिन ऐसे होते हैं, जब सूर्य की रोशनी पूरे दिन भर उपलब्ध रहती है।

सौर्य ऊर्जा का उपयोग :

सौर्य ऊर्जा का उपयोग कई प्रकार से हो सकता है अनाज को सुखाने, जल उष्मन, खाना पकाने, प्रशीतन, जल परिष्करण तथा विद्युत ऊर्जा उत्पादन हेतु किया जा सकता है। फोटो वोल्टायिक प्रणाली द्वारा सूर्य के प्रकाश को विद्युत में रूपान्तरित करके- प्रकाश प्राप्त किया जा सकता है, प्रशीलन का कार्य किया जा सकता है, दूरभाष, टेलीविजन, रेडियो तथा पंखे व जल-पम्प आदि चलाए जा सकते हैं।

सौर्य ऊर्जा से गरम जल की प्राप्ति

सौर-उष्मा पर आधारित प्रौद्योगिकी का उपयोग घरेलू, व्यापारिक व औद्योगिक इस्तेमाल के लिए जल को गरम करने में किया जा सकता है। देश में पिछले दो दशकों से सौर जल-उष्मक बनाए जा रहे हैं। लगभग 500000 वर्गमीटर से अधिक क्षेत्रफल के सौर जल उष्मा संग्राहक संस्थापित किए जा चुके हैं जो प्रतिदिन 300 लाख लीटर जल को 60॰-70° से० तक गरम करते हैं।

सौर्य ऊर्जा
solar watter heater

भारत सरकार का अपराम्परिक ऊर्जा स्रोत मंत्रालय इस ऊर्जा के उपयोग को प्रोत्साहन देने हेतु प्रौद्योगिकी विकास, प्रमाणन, आर्थिक एवं वित्तीय प्रोत्साहन, जन-प्रचार आदि कार्यक्रम चला रहे है। इसके फलस्वरूप प्रौद्योगिकी अब लगभग परिपक्वता प्राप्त कर चुकी है तथा इसकी दक्षता और आर्थिक लागत में भी काफी सुधार हुआ है।

वृहद् पैमाने पर क्षेत्र-परिक्षणों द्वारा यह साबित हो चुका है कि आवासीय भवनों, रेस्टोरेंट, होटलों, अस्पतालों व विभिन्न उद्योगों (खाद्य परिष्करण, औषधि, वस्त्र, डिब्बा बन्दी, आदि) के लिए यह एक उचित प्रौद्योगिकी है। जब हम सौर उष्मक से जल गर्म करते हैं तो इससे उच्च आवश्यकता वाले समय में बिजली की बचत होती है। 100 लीटर क्षमता के 1000 घरेलू सौर जल-उष्मकों से एक मेगावाट बिजली की बचत होती है। साथ ही 100 लीटर की क्षमता के एक सौर उष्मक से कार्बन डाई आक्साइड के उत्सर्जन में प्रतिवर्ष 1.5 टन की कमी होगी। इन संयंत्रों का जीवन-काल लगभग 20-25 वर्ष का है।

सौर-पाचक (सोलर कुकर)

सौर उष्मा द्वारा खाना पकाने से विभिन्न प्रकार के परम्परागत ईंधनों की बचत होती है। बाक्स पाचक, वाष्प-पाचक व उष्मा भंडारक प्रकार के एवं भोजन पाचक, सामुदायिक पाचक आदि प्रकार के सौर-पाचक विकसित किए जा चुके हैं। ऐसे भी बाक्स पाचक विकसित किए गये हैं जो बरसात या धुंध के दिनों में बिजली से खाना पकाने हेतु प्रयोग किए जा सकते हैं।

आदित्य सौर कार्यशालाएँ

भारत सरकार के अपारम्परिक ऊर्जा स्रोत मंत्रालय के सहयोग से देश के विभिन्न भागों में आदित्य सौर कार्यशालाएँ स्थापित की जा रही हैं नवीकरणीय ऊर्जा उपकरणों की बिक्री, रखरखाव, मरम्मत एवं तत्सम्बन्धी सूचना का प्रचार-प्रसार इनका मुख्य कार्य होगा। सरकार इस हेतु एकमुश्त धन और दो वर्षों तक कुछ आवर्ती राशि उपलब्ध कराती है। यह अपेक्षा रखी गयी है कि ये कार्यशालाएँ ग्राहक-सुखद रूप से कार्य करेंगी । सौर फोटो वोल्टायिक कार्यक्रम सौर फोटो वोल्टायिक तरीके से ऊर्जा, प्राप्त करने के लिए सूर्य की रोशनी को सेमीकन्डक्टर की बनी सोलार सेल पर डाल कर बिजली पैदा की जाती है। इस प्रणाली में सूर्य की रोशनी से सीधे बिजली प्राप्त कर कई प्रकार के कार्य सम्पादित किये जा सकते हैं।

भारत उन अग्रणी देशों में से एक है जहाँ फोटो वोल्टायिक प्रणाली प्रौद्योगिकी का समुचित विकास किया गया है एवं इस प्रौद्योगिकी पर आधारित विद्युत उत्पादक इकाईयों द्वारा अनेक प्रकार के कार्य सम्पन्न किये जा रहे हैं। देश में 10 कम्पनियों द्वारा सौर सेलों का निर्माण किया जा रहा है एवं 25 द्वारा फोटोवोल्टायिक माड्यूलों का। लगभग 50 कम्पनियां फोटो वोल्टायिक प्रणालियों के अभिकल्पन, समन्वयन व आपूर्ति के कार्यक्रमों से सक्रिय रूप से जुड़ी हुयी हैं। सन् 1996-99 के दौरान देश में 9.5 मेगावाट के फोटो वोल्टायिक माड्यूल निर्मित किए गये ।

भारत सरकार का अपारम्परिक ऊर्जा स्रोत मंत्रालय सौर लालटेन, सौर-गृह, सौर सार्वजनिक प्रकाश प्रणाली, जल-पम्प, एवं ग्रामीण क्षेत्रों के लिए एकल फोटोवोल्टायिक ऊर्जा संयंत्रों के विकास, संस्थापना आदि को प्रोत्साहित कर रहा है।फोटो वोल्टायिक प्रणाली माड्यूलर प्रकार की होती है। इनमें किसी प्रकार के जीवाष्म उर्जा की खपत नहीं होती है तथा इनका रख रखाव व परिचालन सुगम है। साथ ही ये पर्यावरण सुहृद हैं। दूरस्थ स्थानों, रेगिस्तानी इलाकों, पहाड़ी क्षेत्रों, द्वीपों, जंगली इलाकों आदि, जहाँ प्रचलित ग्रिड प्रणाली द्वारा बिजली आसानी से नहीं पहुँच सकती है, के लिए यह प्रणाली आदर्श है। अतएव फोटो वोल्टायिक प्रणाली दूरस्थ दुर्गम स्थानों की दशा सुधारने में अत्यन्त उपयोगी है।

सौर लालटेन

सौर लालटेन एक हल्का वाला फोटो वोल्टायिक तंत्र है। इसके अन्तर्गत लालटेन, रख रखाव रहित बैटरी, इलेक्ट्रानिक नियंत्रक प्रणाली, व 7 वाट का छोटा फ्लुओरेसेन्ट लैम्प युक्त माड्यूल तथा एक 10 वाट का फोटो वोल्टायिक माड्यूल आता है। यह घर के अन्दर व घर के बाहर प्रतिदिन 3 से 4 घंटे तक प्रकाश दे सकने में सक्षम है। केरोसिन आधारित लालटेन, ढ़िबरी, पेट्रोमैक्स आदि का यह एक आदर्श विकल्प है। इनकी तरह न तो इससे धुआँ निकलता है, न आग लगने का खतरा है और न स्वास्थ्य खराब होता है । अबतक लगभग 300000 के उपर सौर लालटेने देश के ग्रामीण इलाकों में कार्यरत हैं।

सौर जल-पम्प

फोटो वोल्टायिक प्रणाली द्वारा पीने व सिंचाई के लिए कुओं आदि से जल का पम्प किया जाना भारत के लिए एक अत्यन्त उपयोगी प्रणाली है। सामान्य जल पम्प प्रणाली में फोटो वाल्टायिक माड्यूल, एक मोटर युक्त पम्प एवं अन्य आवश्यक उपकरण होते हैं। अबतक 15000 से उपर सौर जल पम्प संस्थापित किये जा चुके हैं।

॰ ग्रामीण विद्युतीकरण फोटोवोल्टायिक सेलों पर आधारित बिजली घरों से ग्रिड स्तर की बिजली ग्रामवासियों को प्रदान की जा सकती है। इन बिजली घरों में अनेकों सौर सेलों के समूह, स्टोरेज बैटरी एवं अन्य आवश्यक नियंत्रक उपकरण होते हैं। बिजली को घरों में वितरित करने के लिए स्थानीय सौर ग्रिड की आवश्यकता होती है। इन संयंत्रों से ग्रिड स्तर की बिजली व्यक्तिगत आवासों, सामुदायिक भवनों व व्यापारिक केन्द्रों को प्रदान की जा सकती है। इनकी क्षमता 1.25 किलोवाट तक होती है।

अबतक लगभग एक मेगावाट की कुल क्षमता के ऐसे संयंत्र देश के विभिन्न हिस्सों में लगाए जा चुके हैं। इनमें उत्तर प्रदेश, देश का उत्तर पूर्वी क्षेत्र, लक्षद्वीप, बंगाल का सागर द्वीप, व अन्डमान निकोबार द्वीप समूह प्रमुख हैं। सार्वजनिक सौर प्रकाश प्रणाली ग्रामीण इलाकों में सार्वजनिक स्थानों एवं गलियों, सड़कों आदि पर प्रकाश करने के लिए ये उत्तम प्रकाश स्रोत है। इसमें 75 वाट का एक फोटो वोल्टायिक माड्यूल, एक 75 अम्पीयर की कम रख-रखाव वाली बैटरी तथा 11 वाट का एक फ्लुओरेसेन्ट लैम्प होता है। शाम होते ही यह अपने आप जल जाता है और प्रात:काल बुझ जाता है। देश के विभिन्न भागों में अबतक 50000 से अधिक इकाईयां लगायी जा चुकी है।

घरेलू सौर प्रणाली घरेलू सौर प्रणाली के अन्तर्गत 2 से 4 Led बल्ब जलाए जा सकते हैं, साथ ही इससे छोटा डीसी पंखा और एक छोटा टेलीविजन 2 से 3 घंटे तक चलाए जा सकते हैं। इस प्रणाली में 40 वाट का फोटो वोल्टायिक पैनेल व 40 अंपियर की अल्प रख-रखाव वाली बैटरी होती है। ग्रामीण उपयोग के लिए इस प्रकार की बिजली का स्रोत ग्रिड स्तर की बिजली के मुकाबले काफी अच्छा है। अबतक पहाड़ी, जंगली व रेगिस्तानी इलाकों के लगभग 125000 घरों में यह प्रणाली लगायी जा चुकी है।

खामियां

सौर्य ऊर्जा की कई परेशानियां भी होती हैं। व्यापक पैमाने पर बिजली निर्माण के लिए पैनलों पर भारी निवेश करना पड़ता है। दूसरा, दुनिया में अनेक स्थानों पर सूर्य की रोशनी कम आती है, इसलिए वहां सोलर पैनल कारगर नहीं हैं। तीसरा, सोलर पैनल बरसात के मौसम में ज्यादा बिजली नहीं बना पाते। विशेषज्ञों का मत है कि भविष्य में मोनोक्रिस्टेलाइन पैनलों द्वारा सौर ऊर्जा का अधिकाधिक प्रयोग होगा। भारत के प्रधानमंत्री ने हाल में सिलिकॉन वैली की तरह भारत में सोलर वैली बनाये जाने की इच्छा जताई है ।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *