विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी | effective

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी


विज्ञान के विकास से प्रौद्योगिकी का विकास होता है , क्योंकि बहुत सारी प्रौद्योगिकियाँ वैज्ञानिक सिध्दांतों पर आधारित हैं | ठीक इसी प्रकार प्रौद्योगिकी के विकास से विज्ञान का विकास होता है , क्योंकि बहुत से प्रयोग तभी किए जा सकते हैं जब उसके लिए आवश्यक उन्नत उपकरण और सहायक साधन उपलब्ध हों |

किसी देश का विकास वहाँ के लोगों के विकास के साथ सम्बन्ध रखता है। अतः यह जरूरी है कि जीवन के हर पहलू में विज्ञान-तकनीक और शोध कार्य अहम भूमिका निभाएँ। विकास के पथ पर कोई देश तभी अग्रसर होता है जब उसकी आने वाली पीढ़ी के लिये सूचना और ज्ञान आधारित वातावरण बने और उच्च शिक्षा के स्तर पर शोध तथा अनुसंधान के उचित संसाधन उपलब्ध हों।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी

UNESCO के अनुसार, ज्ञान के भंडार को बढ़ाने के लिये योजनाबद्ध ढंग से किए गए सृजनात्मक कार्य को ही रिसर्च यानी अनुसंधान एवं डेवलपमेंट या विकास कहा जाता है। इसमें मानव जाति, संस्कृति और समाज का ज्ञान शामिल है,और इन उपलब्ध ज्ञान के स्रोतों से नए अनुप्रयोगों (Applications) को विकसित करना ही अनुसंधान और विकास का मूल उद्देश्य है। रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D) के तहत प्रमुखतः तीन प्रकार की गतिविधियाँ शामिल हैं- Basic Research, Applied Research और Experimental Development.

अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में भारत की उपलब्धियाँ

॰ इंडियन साइंस एंड रिसर्च एंड डेवलपमेंट इंडस्ट्री रिपोर्ट 2019 के अनुसार भारत बुनियादी अनुसंधान के क्षेत्र में शीर्ष रैंकिंग वाले देशों में शामिल है।
॰ विश्व की तीसरी सबसे बड़ी वैज्ञानिक और तकनीकी जनशक्ति भी भारत में ही है।
॰ वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) द्वारा संचालित शोध प्रयोगशालाओं के जरिये विभिन्न शोधकार्य किये जाते हैं।

॰ भारत विज्ञान और प्रौद्योगिकी अनुसंधान के क्षेत्र में अग्रणी देशों में सातवें स्थान पर है।
॰ मौसम पूर्वानुमान एवं निगरानी के लिये प्रत्युष नामक शक्तिशाली सुपर कंप्यूटर बनाकर भारत इस क्षेत्र में जापान, ब्रिटेन और अमेरिका के बाद चौथा प्रमुख देश बन गया है।

॰ नैनो तकनीक पर शोध के मामले में भारत दुनियाभर में तीसरे स्थान पर है।
॰ Global Innovation Index 2020 में हम 48वें स्थान पर हैं।
॰ भारत ब्रेन ड्रेन से ब्रेन गेन की स्थिति में पहुँच रहा है और विदेशों में काम करने वाले भारतीय वैज्ञानिक स्वदेश लौट रहे हैं।

॰ व्यावहारिक अनुसंधान गंतव्य के रूप में भारत उभर रहा है तथा पिछले कुछ वर्षों में हमने अनुसंधान और विकास में निवेश बढ़ाया है।
॰ वैश्विक अनुसंधान एवं विकास खर्च में भारत की हिस्सेदारी 2017 के 3.70% से बढ़कर 2018 में 3.80% हो गई।
॰ भारत एक वैश्विक अनुसंधान एवं विकास हब के रूप में तेजी से उभर रहा है। देश में मल्टी-नेशनल कॉर्पोरशन रिसर्च एंड डेवलपमेंट केंद्रों की संख्या 2010 में 721 थी और अब नवीनतम आँकड़ों के अनुसार यह 2018 में 1150 तक पहुँच गई है।

॰ स्वतंत्रता के बाद भारत के विकास में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की अहम भूमिका रही है। आजादी के बाद से विज्ञान के क्षेत्र को प्राथमिकता दी गयी है। वर्तमान सरकार भी विज्ञान के प्रति पूर्ण समर्पित है। इसका सबूत है कि पिछले 5 वर्षों में इस क्षेत्र में बजट आवंटन में 92 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। हाल ही में प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रीय विज्ञान दिवस का उल्लेख करते हुए विज्ञान के माध्यम से विकास के अवसरों का जिक्र भी किया था।

॰ जनमानस में वैज्ञानिक अनुप्रयोग के महत्व के संदेश को व्यापक तौर पर प्रसारित करने के लिए हर वर्ष 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस आयोजन के द्वारा मानव कल्याण के लिये विज्ञान के क्षेत्र में घटित होने वाली प्रमुख गतिविधियों, प्रयासों और उपलब्धियों को प्रदर्शित किया जाता है।

॰ विज्ञान से होने वाले लाभों के प्रति समाज में जागरूकता लाने और वैज्ञानिक सोच पैदा करने के उद्देश्य से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत कार्यरत राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद की पहल पर इस अवसर पर पूरे देश में अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इस वर्ष जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा संयुक्त रूप से राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम “सतत भविष्य के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी” विषय पर आयोजित था।

॰ असल में हर वर्ष राष्ट्रीय विज्ञान दिवस की एक केन्द्रीय विषय-वस्तु होती है, जिसके इर्द-गिर्द पूरे देश में अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। इस साल की थीम ‘सतत भविष्य के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी’ है।

” विज्ञान से होने वाले लाभों के प्रति समाज में जागरूकता लाने और वैज्ञानिक सोच पैदा करने के उद्देश्य से विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत कार्यरत राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद की पहल पर इस अवसर पर पूरे देश में अनेक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।”

इस कार्यक्रम में देश के प्रमुख वैज्ञानिकों सहित विद्यार्थियों ने भाग लिया। जेएनयू के कुलपति प्रोफेसर एम जगदीश कुमार ने

“सतत भविष्य के लिए प्रौद्योगिकी” विषय पर बोलते हुए कहा कि सतत भविष्य में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों में अधिक निवेश करना होगा। सौर ऊर्जा के महत्व को स्वीकारते हुए उन्होंने कहा कि ”सौर ऊर्जा उत्पादन में उन्नत बैट्री का विकास किया जाना आवश्यक है। ऐसी बैट्रियों का विकास होना चाहिए जो छोटी और वहनीय होने के साथ ही अधिक दक्ष हो। इसके लिए बैट्ररी निर्माण के लिए लीथियम की बजाय अन्य स्रोत खोजना होगा जो प्रचुर मात्रा में हो और उसके लिए हमें किसी अन्य देश पर निर्भर न रहना पड़े। उन्होंने स्वास्थ्य, जल संरक्षण, कृषि आदि क्षेत्रों के तीव्र विकास के लिए नयी तकनीकों के निर्माण की बात भी कही।”

इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रोफेसर आशुतोष शर्मा ने अपने वक्तव्य में कहा कि

“सर सी वी रामन सहित अनेक भारतीय वैज्ञानिकों ने विज्ञान में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। हमें उनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए। इसके लिए हमें विज्ञान ही नहीं हर क्षेत्र में सतत विकास को प्राथमिकता देनी होगी। हमें सतत विकास के उस चक्र को समझना होगा जो उस ज्ञान पर आधारित है ,जो प्रयोगशालाओं एवं वैज्ञानिक संस्थानों से उत्पन्न होकर समाज के लिए लाभदायक सिद्ध होता है। हमें प्रौद्योगिकी से समाज को जोड़ने के लिए दीर्घकालीन सोच का विकास करना होगा। इसके लिए कृत्रिम बौद्धिकता, बिग डाटा जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग करना होगा।”

राष्ट्रीय विज्ञान संग्राहलय परिषद्, कोलकाता के महानिदेशक श्री ए.के. मानेकर ने ‘इक्कीसवीं सदीं में विज्ञान संचार के समक्ष चुनोतियां एवं संभावना” विषय पर बोलते हुए कहा कि विज्ञान केवल छात्रों के लिए ही नहीं हम सभी के लिए है। विज्ञान का संबंध हर व्यक्ति से है। इसी उद्देश्य के साथ विज्ञान संचार भी समाज के मध्य वैज्ञानिक चेतना के विकास के लिए कार्यरत है।

विज्ञान प्रसार, राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद् , एनसीईआरटी, यूजीसी, निस्केयर जैसे अनेक संस्थाएं विज्ञान संचार के लिए कार्यरत हैं।लेकिन फिर भी विज्ञान संचार के क्षेत्र में अनेक चुनौतियां हैं। उन चुनौतियों के लिए विज्ञान लेखकों एवं विज्ञान संचारकों को तैयार रहना है। आधुनिक जनसंचार माध्यमों द्वारा समाज में व्याप्त अंधविश्वासों के बारे में सही जानकारी को प्रसारित करना आवश्यक है।

आज राष्ट्रीय विज्ञान संग्राहलय परिषद् के द्वारा विकसित विज्ञान केन्द्र, विज्ञान पार्क, विज्ञान नगरी केवल विज्ञान के प्रदर्शनों तक सीमित न होकर जनमानस में विभिन्न वैज्ञानिक विषयों के प्रति जागरूकता का प्रसार कर रहे हैं चाहे बात जलवायु परिवर्तन की हो या फिर जीनांतरित फसलों की। जल संरक्षण से लेकर सतत विकास तक के हर एक विषय पर विज्ञान संग्राहलय जनमानस में जागरूकता का प्रसार कर रहे हैं।
इस अवसर पर राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद के प्रमुख श्री चंद्र मोहन एवं शोध एवं विकास प्रभाग, जेएनयू के निदेशक डॉ. रूपेश चतुर्वेदी प्रो॰ विभा टंडन सहित अनेक वरिष्ठ वैज्ञानिक भी उपस्थित थे।

भारतीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का इतिहास

भारत की विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की विकास-यात्रा प्रागैतिहासिक काल से आरम्भ होती है। भारत का अतीत ज्ञान से परिपूर्ण था और भारतीय संसार का नेतृत्व करते थे। सबसे प्राचीन वैज्ञानिक एवं तकनीकी मानवीय क्रियाकलाप मेहरगढ़ में पाये गये हैं, जो अब पाकिस्तान में है। सिन्धु घाटी की सभ्यता से होते हुए यह यात्रा राज्यों एवं साम्राज्यों तक आती है।

यह यात्रा मध्यकालीन भारत में भी आगे बढ़ती रही; ब्रिटिश राज में भी भारत में विज्ञान एवं तकनीकी की प्रयाप्त प्रगति हुई तथा स्वतंत्रता की प्राप्ति के बाद भारत विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के सभी क्षेत्रों में तेजी से प्रगति कर रहा है। सन् 2008 में चन्द्रमा पर यान भेजकर एवं वहाँ पानी की प्राप्ति का नया खोज करके इस क्षेत्र में भारत ने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की है।

चार शताब्दियों पूर्व प्रारंभ हुई पश्चिमी विज्ञान व प्रौद्योगिकी संबंधी क्रांति में भारत क्यों शामिल नहीं हो पाया ? इसके अनेक कारणों में मौखिक शिक्षा पद्धति, लिखित पांडुलिपियों का अभाव आदि हैं।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद

॰ 1948 – बीरबल साहनी पुरावनस्पतिविज्ञान संस्थान, लखनऊ की स्थापना ; विज्ञान और औद्योगिक अनुसंधान परिषद की स्थापना। प्रो॰ पी॰ एम॰ ब्लैकेट की सलाह पर ‘सुरक्षा विज्ञान संस्थान’ की स्थापना, ‘राष्ट्रीय सांख्यिकीय संस्थान’ की स्थापना।
॰ 1950 – राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला, राष्ट्रीय रासायनिकी प्रयोगशाला तथा केन्द्रीय ईंधन अनुसंधान संस्थान की स्थापना। राष्ट्रीय विज्ञान संस्थान (भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी) की स्थापना।

॰ 1954 – परमाणु ऊर्जा विभाग की स्थापना।
॰ 1957 – ट्राम्बे में ‘परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान’ (सम्प्रति भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र) की स्थापना
॰ 1958 – जवाहर लाल नेहरू द्वारा संसद में एक ‘विज्ञान नीति’ का प्रस्ताव पारित कराया गया। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डी॰ आर॰ डी॰ ओ॰) की स्थापना।

॰ 1962 – लाल बहादुर शास्त्री की अध्यक्षता में ‘भारतीय संसदीय एवं वैज्ञानिक समिति’ की स्थापना। खड्गपुर, मुंबई, चेन्नई, कानपुर एवं दिल्ली में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान स्थापित। इंडियन नेशनल कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च की स्थापना। राष्ट्रीय क्षय (तपेदिक) नियंत्रण कार्यक्रम की शुरुआत ।

॰ 1963 – केरल के त्रिवेन्द्रम के निकट राकेट प्रक्षेपण सुविधा केन्द्र की स्थापना।
॰ 1966 – गोवा में राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान की स्थापना।
॰ 1968 – वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून की स्थापना।
॰ 1969 – बंगलोर में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) की स्थापना, ग्रामीण विद्युतीकरण निगम की स्थापना, तारापुर में परमाणु सयंत्र की स्थापना।

॰ 1971 – इलेक्ट्रोनिक्स विभाग की स्थापना, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग की स्थापना, बम्बई में ‘भारतीय भू-चुम्बकत्व संस्था’ की स्थापना।
॰ 1972 – अंतरिक्ष आयोग और अंतरिक्ष विभाग की स्थापना।
॰ 1974 – पोखरण में भारत का पहला भूमिगत परमाणु परीक्षण सफलतापूर्वक सम्पन्न।

॰ 1975 – भारत का प्रथम कृत्रिम उपग्रह ‘आर्यभट्ट’ प्रक्षेपित। ‘राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम’ (NTPC) एवं ‘राष्ट्रीय जल विद्युत निगम’ (NHPC) की स्थापना। पाँचवी पंचवर्षीय योजना में भारतीय योजना के इतिहास में पहली बार विज्ञान और प्रौद्योगिकी के लिए 1.17 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया।
॰ 1981 – श्री चित्रा तिरुनल इंस्टीट्यूट फॉर मेडिकल साइंसेज एण्ड टेक्नोलॉजी, त्रिवेन्द्रम की स्थापना। कोशिकीय एवं आण्विक जीव विज्ञान केन्द्र हैदराबाद की स्थापना।

॰ 1982 – अपराम्परिक ऊर्जा स्रोत विभाग की स्थपना।
॰ 1983 – समेकित निर्देशित प्रक्षेपास्त्र विकास कार्यक्रम का आरम्भ।
॰ 1984 – इन्दौर में प्रगत प्रौद्योगिकी केन्द्र (सम्प्रति राजा रामन्ना प्रगत प्रौद्योगिकी केन्द्र इंदौर) की स्थापना। प्रथम अण्टार्कटिका अभियान दल भेजा गया।

॰ 1998 – पोखरण में भारत का द्वितीय भूमिगत परमाणु परीक्षण।
॰ 2008 – भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने चन्द्रमा पर चन्द्रयान भेजा।
॰ 2014 – भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का मंगलयान मंगल ग्रह की कक्षा में स्थापित।

अनुसंधान और विकास के क्षेत्र में भारत के समक्ष चुनौतियाँ

कुछ चुनिंदा क्षेत्रों में उपलब्धियों को छोड़ दें तो वैश्विक संदर्भ में भारत के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विकास तथा अनुसंधान की स्थिति धरातल पर उतनी मज़बूत नहीं, जितनी कि भारत जैसे बड़े देश की होनी चाहिये। ऐसे में कुछ तथ्यों पर गौर करना ज़रूरी है। जैसे- भारत विश्व में वैज्ञानिक प्रतिद्वंद्विता के नज़रिये से कहाँ है? नोबेल पुरस्कार एक विश्व-प्रतिष्ठित विश्वसनीय पैमाना है जो विज्ञान और शोध के क्षेत्र में हासिल की गई उपलब्धियों के जरिये किसी देश की वैज्ञानिक ताकत को बतलाता है।

इस मामले में हमारी उपलब्धि लगभग शून्य है। वर्ष 1930 में सर सी.वी. रमन को मिले नोबेल पुरस्कार के बाद से अब तक कोई भी भारतीय वैज्ञानिक इस उपलब्धि को हासिल नहीं कर पाया। कारण स्पष्ट है कि देश में मूलभूत अनुसंधान के लिये न तो उपयुक्त अवसंरचना है, न वांछित परियोजनाएँ हैं और न ही उनके लिये पर्याप्त धन उपलब्ध है।

सरकार द्वारा की गई नवीनतम पहलें

॰ वर्ष 2018-19 की नवीनतम पहलों की बात करें तो इसमें इंटर-डिसिप्लिनरी साइबर-फिजिकल सिस्टम्स पर राष्ट्रीय मिशन (NM-ICPS) और द ग्लोबल कूलिंग प्राइज़ शामिल हैं।
॰ इसके अलावा भारतीय और आसियान शोधकर्त्ताओं, वैज्ञानिकों और नवोन्मेषकों के बीच नेटवर्क बनाने के उद्देश्य से आसियान-भारत इनोटेक शिखर सम्मेलन का आयोजन किया गया।

॰ कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य प्रौद्योगिकियों, साइबर सुरक्षा और स्वच्छ विकास को बढ़ावा देने की संभावनाओं को साकार करने वाली वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिये भारत-UK साइंस एंड इनोवेशन पॉलिसी डायलॉग के ज़रिये भारत और ब्रिटेन मिलकर काम कर रहे हैं।

॰ वाहनों के प्रदूषण से निपटने के लिये वायु-WAYU (Wind Augmentation & Purifying Unit) डिवाइस लगाए जा रहे हैं।
॰ विदेशों में एक्सपोज़र और प्रशिक्षण प्राप्त करने के उद्देश्य से विद्यार्थियों के लिये ओवरसीज विजिटिंग डॉक्टोरल फेलोशिप प्रोग्राम चलाया जा रहा है।

॰ जनसामान्य के बीच भारतीय शोधों के बारे में जानकारी देने और उनका प्रसार करने के लिये अवसर-AWSAR (ऑगमेंटिंग राइटिंग स्किल्स फॉर आर्टिकुलेटिंग रिसर्च) स्कीम इत्यादि जैसी अन्य कई योजनाएँ चलाई जा रही हैं।
॰ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने दूरदर्शन और प्रसार भारती के साथ मिलकर विज्ञान संचार के क्षेत्र में डीडी साइंस और इंडिया साइंस नाम की दो नई पहलों की भी शुरुआत की है।

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